बस! जरा सा ख्वाब !

भूल गई हूं तुमहें
फिर भी क्यों याद आते हो
बस! जरा सा ख्वाब दिखाकर
ओझल क्यों हो जाते हो।

न जाने किस घङी तुमसे मुलाकात हुई,
एक एहसास बन गए तुम
क्यो! जरा सा ख्वाब दिखाकर
ओझल हो जाते हो तुम।

नम हो जाती है मेरी आँखें,
जब नहीं देखती तुम्हें अपने निकट
आखिर हो गए इतने पराऐ
मुझे अपना बनाकर।

कहाँ खो जाते हो,
मुझे आशाओं से बांधकर
इतने करीब होकर
क्यों बेगाने से लगते हो।

जहाँ तुम, वही है मेरा जाहान
पर इस जाहान को पाना नहीं है आसान।
फिर क्यों रंगीन ख्वाब दिखाकर
पल भर में ओझल हो जाते हो!

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